सन्दर्भ :-

  • संयुक्त राष्ट्र के लगभग पचहत्तर प्रतिशत राहत-कार्य अफ्रीका पर केंद्रित हैं, पर अफ्रीका महाद्वीप का कोई देश सुरक्षा परिषद में नहीं है।
  • विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था, सबसे बड़ा लोकतंत्र, संयुक्त राष्ट्र की शांतिरक्षक टुकड़ियों में सर्वाधिक योगदान करने वाले देशों में से एक और बेहतरीन राजनीतिक साख वाला देश भारत भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से वंचित है।
  • आइसीजे में दलवीर भंडारी की नियुक्ति के मसले से पूर्व भी जून 2017 में संयुक्त राष्ट्र के भीतर महासभा और सुरक्षा परिषद की मंशाओं के बीच विभाजन तब स्पष्ट हो गया था जब लगभग एक स्वर से महासभा ने मॉरीशस के आइसीजे में जाने के उस प्रस्ताव को समर्थन दिया था जब मॉरीशस ने चागोस द्वीपसमूह पर अपनी संप्रभुता का दावा ब्रिटेन के विरुद्ध पेशकिया था।
  • उस वक्त भी संयुक्त राष्ट्र में अपेक्षित सुधारों का मुद््दा भारत ने जोर-शोर से उठाया था और उसने इस प्रस्ताव पर मॉरीशस के पक्ष में अपना मत दिया था। यूरोपीय संघ ने इस मतदान में भाग नहीं लिया, पर बाकी सभी पारंपरिक शक्तियों ने ब्रिटेन का साथ दिया।

मुख्य बिन्दु

  • भारत की ब्रिटेन से आजादी के ही साल जनमे न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस- आइसीजे), हेग के पंद्रह सदस्यीय पैनल में लगातार दूसरी बार अगले नौ साल के लिए चुन लिये गए, जब उनके खिलाफ उम्मीदवार रहे ब्रिटेन के क्रिस्टोफर ग्रीनवुड ने आखिरी समय में अपनी दावेदारी वापस ले ली।
  • सर क्रिस्टोफर जॉन ग्रीनवुड लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में कानून के प्रोफेसर हैं और इनकी आलोचना इनके उन विधिक तर्कों के लिए पूरे विश्व में की जाती है, जिनके सहारे ब्रिटेन ने 2002 में इराक पर अपने सैन्य बलप्रयोग को उचित ठहराया था।
  • ब्रिटेन ने यह कहते हुए अपनी दावेदारी वापस ले ली कि जबकि उनका देश यह चुनाव नहीं जीत सकता, उन्हें खुशी है कि उनके नजदीकी मित्र भारत ने यह दावेदारी जीत ली है और वे संयुक्त राष्ट्र व वैश्विक पटल पर भारत का सहयोग करते रहेंगे।
  • हालांकि ब्रिटिश और अमेरिकी मीडिया ने ब्रिटेन की इस हार को शर्मनाक बताया है क्योंकि संस्थापक-सदस्य ब्रिटेन पिछले इकहत्तर वर्षों में पहली बार इस पंद्रह सदस्यीय जजों के पैनल से बाहर होगा और चीन के बाद यह दूसरा मौका होगा जब कोई वीटो शक्ति-संपन्न देश इस पैनल में अपना स्थान बनाने से चूक गया है।
  • आइसीजे संयुक्त राष्ट्र का विधिक अधिकरण है जो सदस्य-राष्ट्रों के मध्य उपजे विवादों पर अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार निर्णय करता है। हाल ही में आइसीजे ने पूर्व भारतीय नेवी अफसर कुलदीप जाधव को, जो अपहृत होने के पूर्व ईरान में व्यवसाय कर रहे थे, पाकिस्तान की सैन्य अदालत के द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा पर रोक लगा दी थी। यह सजा उन्हें तथाकथित जासूसी के आरोप में सुनाई गई थी। ईरान के शामिल हो जाने के कारण यह मामला द्विपक्षीय न होकर त्रिपक्षीय हो गया था और इसी कारण भारत ने इस अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अर्जी लगाई थी।
  • आइसीजे के मुख्य न्यायाधीश रॉनी अब्राहम द्वारा सुनाए गए और पंद्रह सदस्यीय न्यायाधीशों के समूह द्वारा तैयार किए गए इस फैसले में दलवीर भंडारी भी शामिल थे।
  • दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति दरअसल भारतीय कूटनीति की स्पष्ट विजय की द्योतक है।
  • संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि सैयद अकबरुद््दीन ने अपने दूसरे भारतीय अधिकारी सहयोगियों के साथ, भारत सरकार के निर्देशन में, एक बेहतर लामबंदी की और नतीजा भारत के पक्ष में आया।
  • यह जीत वाकई कठिन थी क्योंकि नियुक्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद और महासभा, दोनों में बहुमत की आवश्यकता होती है।
  • वीटो शक्ति-संपन्न पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन) और वीटो शक्तिरहित दस अस्थायी सदस्यों(बोलीविया, मिस्र, इथोपिया, इटली, जापान, कजाखस्तान, सेनेगल, स्वीडन, यूक्रेन और उरुग्वे) से बनी सुरक्षा परिषद में भारत को कुल पंद्रह में से महज पांच मतों का समर्थन था। लेकिन महासभा में, जिसमें सभी सदस्य-राष्ट्रों की भागीदारी रहती है, ब्रिटेन के मुकाबले भारत ने ग्यारह चरणों में हर बार दो-तिहाई से अधिक समर्थन हासिल किया।
  • यह प्रतिस्पर्धा ऊपरी तौर पर दलवीर भंडारी और क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के बीच थी, पर हकीकत में यह प्रतिस्पर्धा सुरक्षा परिषद और महासभा की मंशाओं तथा संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के खिलाफ और सुधारों के पक्षकारों के मध्य थी।
  • लंबे समय से भारत सुरक्षा परिषद में सुधारों की वकालत करता रहा है और जापान, जर्मनी व ब्राजील के साथ मिल कर लामबंदी भी।
  • सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में जहां केवल फ्रांस वीटोयुक्त भारतीय दावेदारी को समर्थन देता है, वहीं चीन के मुताबिक सुधारों का यह उचित समय नहीं है और अमेरिका सहित बाकी देश सुरक्षा परिषद के विस्तार की जरूरत को वीटो-विहीन सदस्यता के तौर पर दबे स्वर में स्वीकार करते हैं।

राष्ट्र संघ

  • प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद राष्ट्र संघ की स्थापना की गई, ताकि ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति न हो, मगर बाईस सालों के भीतर ही द्वितीय विश्वयुद्ध की भेरी बज गई थी।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध एटमी हमले में जापान के तबाह हो जाने के साथ ही संपन्न हुआ और एक बार फिर विश्व शांति की गरज से संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन 1945 में किया गया। सभी सदस्य-राष्ट्र जहां महासभा के सदस्य बने, वहीं द्वितीय विश्वयुद्धों के विजेता देशों ने संयुक्त राष्ट्र के भीतर ही सर्वाधिक निर्णायक सुरक्षा परिषद का गठन किया।
  • सुरक्षा परिषद के निर्णयों के लिए पूर्ण सहमति एक अनिवार्य शर्त है और इसके क्रियान्वयन के लिए ही वीटो का प्रावधान किया गया, जिसके तहत चार के मुकाबले एक सदस्य भी किसी निर्णय में यदि असहमति दर्ज करता है तो कोई प्रस्ताव पास नहीं होगा।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक व्यवस्था कमोबेश इन्हीं पश्चिमी देशों के हितों के अनुरूप चलती रही- बस, ब्रिटेन की जगह अमेरिका ने ले ली। अब संयुक्त राष्ट्र की दशकों पुरानी संरचना में सुधार अनिवार्य है, बशर्ते ये निर्णायक राष्ट्र तैयार हों।
  • केवल इसलिए नहीं कि ये पांच निर्णायक राष्ट्र विश्व-व्यवस्था में मनमाना रवैया रखते हैं बल्कि इनके नेतृत्व वाला संयुक्त राष्ट्र न ही आज की बहुपक्षीय आर्थिक-राजनीतिक विश्व प्रणाली का प्रतिनिधित्व करता है और न ही यह बहुधा वैश्विक विवादों का समाधान ही दे पा रहा है।
  • दारफूर संकट, जंजावीड उन्माद, स्रेबेनिका सामूहिक हत्याकांड, इजराइल-अरब संघर्ष, कुवैत संकट और रवांडा संकट के समाधान पर पक्षपात आदि मसलों पर संयुक्त राष्ट्र की विफलता, सुधारों के प्रति इसकी उदासीनता को ही पुष्ट करती है।
  • संयुक्त राष्ट्र के लगभग पचहत्तर प्रतिशत राहत-कार्य अफ्रीका पर केंद्रित हैं, पर अफ्रीका महाद्वीप का कोई देश सुरक्षा परिषद में नहीं है।
  • विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था, सबसे बड़ा लोकतंत्र, संयुक्त राष्ट्र की शांतिरक्षक टुकड़ियों में सर्वाधिक योगदान करने वाले देशों में से एक और बेहतरीन राजनीतिक साख वाला देश भारत भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से वंचित है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह वीटो के बगैर स्थायी सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।

अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय

  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रधान न्यायिक अंग है और इस संघ के पांच मुख्य अंगों में से एक है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणा पत्र के अंतर्गत हुई है।
  • इसका उद्घाटन अधिवेशन 18 अप्रैल 1946 ई. को हुआ था। इस न्यायालय ने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय की जगह ले ली थी। न्यायालय हेग में स्थित है और इसका अधिवेशन छट्टियों को छोड़ सदा चालू रहता है।
  • न्यायालय के प्रशासन व्यय का भार संयुक्त राष्ट्रसंघ पर है।
  • 1980 तक अंतर्राष्ट्रीय समाज इस न्यायालय का ज़्यादा प्रयोग नहीं करती थी, पर तब से अधिक देशों ने, विशेषतः विकासशील देशों ने, न्यायालय का प्रयोग करना शुरू किया है। फ़िर भी, कुछ अहम राष्ट्रों ने, जैसे कि संयुक्त राज्य, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों को निभाना नहीं समझा हुआ है। ऐसे देश हर निर्णय को निभाने का खुद निर्णय लेते है।

सदस्य

  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में समान्य सभा द्वारा 15 न्यायाधीश चुने चाते है। यह न्यायाधीश नौ साल के लिए चुने जाते है और फ़िर से चुने जा सकते है।
  • हर तीसरे साल इन 15 न्यायाधीशों में से पांच चुने जा सकत्ते है। इनकी सेवानिव्रति की आयु, कोई भी दो न्यायाधीश एक ही राष्ट्र के नहीं हो सकते है और किसी न्यायाधीश की मौत पर उनकी जगह किसी समदेशी को दी जाती है। इन न्यायाधीशों को किसी और ओहदा रखना मना है।
  • किसी एक न्यायाधीश को हटाने के लिए बाकी के न्यायाधीशों का सर्वसम्मत निर्णय जरूरी है। न्यायालय द्वारा सभापति तथा उपसभापति का निर्वाचन और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होती है।
  • न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 15 है, गणपूर्ति संख्या नौ है। निर्णय बहुमत निर्णय के अनुसार लिए जाते है। बहुमत से सहमती न्यायाधीश मिलकर एक विचार लिख सकते है, या अपने विचार अलग से लिख सकते है। बहुमत से विरुद्ध न्यायाधीश भी अपने खुद के विचार लिख सकते है।

तदर्थ न्यायाधीश

  • जब किसी दो राष्ट्रों के बीच का संघर्ष अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के सामने आता है, वे राष्ट्र चाहे तो किसी समदेशी तदर्थ न्यायाधीश को नामजद कर सक्ती हैं। इस प्रक्रिया का कारण था कि वह देश जो न्यायालय में प्रतिनिधित्व नहीं है भी अपने संधर्षों के निर्णय अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को लेने दे।

क्षेत्राधिकार

  • अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय संविधि में सम्मिलित समस्त राष्ट्र अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इसका क्षेत्राधिकार संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र अथवा विभिन्न; संधियों तथा अभिसमयों में परिगणित समस्त मामलों पर है।
  • अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय संविधि में सम्मिलत कोई राष्ट्र किसी भी समय बिना किसी विशेष प्रसंविदा के किसी ऐसे अन्य राष्ट्र के संबंध में, जो इसके लिए सहमत हो, यह घोषित कर सकता है कि वह न्यायालय के क्षेत्राधिकार को अनिवार्य रूप में स्वीकार करता है।
  • उसके क्षेत्राधिकार का विस्तार उन समस्त विवादों पर है जिनका संबंध संधिनिर्वचन, अंतरर्राष्ट्रीय विधि प्रश्न, अंतरर्राष्ट्रीय आभार का उल्लंघन तथा उसकी क्षतिपूर्ति के प्रकार एवं सीमा से है।
  • अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय को परामर्श देने का क्षेत्राधिकार भी प्राप्त है। वह किसी ऐसे पक्ष की प्रार्थना पर, जो इसका अधिकारी है, किसी भी विधिक प्रश्न पर अपनी सम्मति दे सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अभियोग दो तरह के होते है : विवादास्पद विषय तथा परामर्शी विचार।

विवादास्पद विषय

  • इस तरह के मुकदमों में दोनो राज्य के लिए न्यायालय का निर्णय निभाना आवश्यक होता है। केवल राज्य ही विवादास्पद विषयों में शामिल हो सक्ते हैं : व्यक्यियां, गैर सरकारी संस्थाएं, आदि ऐसे मुकदमों के हिस्से नहीं हो सकते हैं। ऐसे अभियोगों का निर्णय अंतराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा तब ही हो सकता है जब दोनो देश सहमत हो। इस सहमति को जताने के चार तरीके हैं :
  • 1. विशेष संचिद : ऐसे मुकदमों में दोनो देश अपने आप निर्णय लेना अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को सौंपते हैं।
  • 2. माध्यमार्ग : आज-कल की संधियों में अक्सर एक शर्त डाली जाती है जिसके अनुसार, अगर उस संधि के बारे में कोई संघर्ष उठे, तो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को निर्णय लेने का अधिकार है।
  • 3. ऐच्छिक घोषणा : राज्यों को अधिकार है कि वे चाहे तो न्यायालय के हर निर्णय को पहले से ही स्वीकृत करें।
  • 4. अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय का अधिकार : क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय की जगह ली थी, जो भी मुकदमें अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में थे, वे सब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में भी हैं।

परामर्शी विचार

  • परामर्शी विचार दूसरा तरीका है किसी मुकदमें को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंचाने का। यह निर्णय सिर्फ न्यायालय की राय होते है, पर इन विचारों के सम्मान के कारण वह बहुत प्रभावशाली होते हैं।

निष्कर्ष

  • हिंद महासागर में चीन की भारतीय उपमहाद्वीप को घेरने की ‘ओबोर’ (वन बेल्ट वन रोड) और ‘पर्ल आॅफ स्ट्रिंग पॉलिसी’ के खिलाफ मॉरीशस के इसी चागोस द्वीपसमूह के एक द्वीप डियागो गार्सिआ पर स्थित भारतीय-अमेरिकी सैन्य अड्डे से सुरक्षा मिलती है।
  • डियागो गार्सिआ ब्रिटिश संप्रभुता में आता रहा है, जिसे रक्षा सहमतियों में अमेरिका और भारत से साझा किया गया है। बल्कि ब्रिटेन ने भारत से इस मामले में अपने प्रभाव का प्रयोग कर मॉरीशस से वार्ता का आग्रह भी किया है।
  • उधर मॉरीशस ने ताइवान मसले पर हमेशा चीन का साथ दिया है और चीन के सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते उससे यह अपेक्षा रखता है कि वह चागोस संप्रभुता के मसले पर मॉरीशस का ही साथ देगा।
  • इस प्रकार भारत के लिए जटिलताएं काफी हैं, पर दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति ने यह आश्वस्ति दी है कि वैश्विक पटल पर भारतीय कूटनीति अपने राष्ट्रहित को बेहतर रीति से सुरक्षित कर पा रही है।