सन्दर्भ :-

  • चीन ने चौथी बार भारत, अमेरिका और कई अन्य मुल्कों के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसमें पठानकोट आतंकी हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की मांग की गई थी।
  • चीन ने ‘प्रतिबंध लगाने वाली समिति के सदस्यों के बीच आम राय न होने’ को अपने इस कदम का आधार बताया है।
  • इस संदर्भ में नई दिल्ली की प्रतिक्रिया गौर करने लायक है। भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि ‘यह वाकई निराशाजनक है कि एक बार फिर एक देश ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने संबंधी अंतरराष्ट्रीय सहमति की राह में अडं़गा डाला है।
  • भारत साफ तौर पर मानता है कि इस तरह के दोहरे मापदंड आतंकवाद से मुकाबला करने के अंतरराष्ट्रीय समुदायों के संकल्प को कमजोर करेंगे।’

मुख्य बिंदू :-

  • पिछले वर्ष सुरक्षा परिषद में एकमात्र चीन था, जिसने मसूद अजहर को 1267 प्रतिबंधितों की सूची में शामिल करने के भारत के प्रस्ताव पर रोक लगा दी थी।
  • अगर ऐसा हो जाता, तो मसूद अजहर की तमाम संपत्ति कुर्क हो सकती थी और उस पर यात्रा प्रतिबंध भी लग सकता था।
  • इस ताजा रुकावट के बावजूद बीजिंग का यह दुस्साहस गौर करने लायक है। उसने कहा है कि वह ‘नए युग के निर्माण के लिए द्विपक्षीय रिश्तों को लगातार मजबूत बनाते हुए भारत के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।’
  • इसके साथ-साथ उन प्रयासों की भी चर्चा की गई, जो उसने पिछले कुछ वर्षों में अपने इस पड़ोसी (भारत) देश के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को बेहतर बनाने और आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए किए हैं।
  • दरअसल, चीन के श्यामन में जारी ब्रिक्स घोषणापत्र 2017 ने भारत में काफी उत्साह पैदा किया था। 43 पेज के उस घोषणापत्र में पहली बार आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया था।
  • इस पर ब्रिक्स के सभी पांचों देश सहमत थे।
  • घोषणापत्र में न सिर्फ क्षेत्र की सुरक्षा-स्थिति पर, बल्कि तालिबान, आईएस, अल-कायदा, इस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और हिज्ब-उत-तहरीर जैसी आतंकी जमातों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा पर भी गहरी ‘चिंता’ जताई गई थी।
  • यह उस देश के रुख में आए बदलाव का संकेत था, जो पिछले साल तक पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे लश्कर और जैश जैसी तंजीमों पर बात करने का पक्षधर नहीं था।
  • 2016 में गोवा में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में ही भारत के तमाम प्रयासों के बाजवूद चीन ने घोषणापत्र में ऐसी किसी आतंकी जमात के जिक्र का विरोध किया था।
  • इस वर्ष चीन और भारत के बीच हुए डोका ला विवाद की छाया में ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हुआ था, इसीलिए भारत के रुख पर चीन की सहमति कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात थी।
  • जहां नई दिल्ली ने बीजिंग को आतंकवाद पर अपना सख्त रुख बताने में सफलता हासिल की, वहीं शी जिनपिंग को भी इसे घोषणापत्र में शामिल करने पर कोई एतराज नहीं था, क्योंकि वह ब्रिक्स सम्मेलन को किसी कीमत पर सफल बनाना चाहते थे।
  • तब चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने अपने मुल्क के रुख को उचित ठहराते हुए कहा था कि इस घोषणापत्र के साथ ब्रिक्स देशों ने ‘इन संगठनों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा पर अपनी चिंता जाहिर की है’।
  • हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा था कि ‘ये सभी संगठन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मान्य हैं और अफगानिस्तान मसले के समाधान में महत्वपूर्ण दखल रखते हैं।’
  • इसे विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ की टिप्पणी से भी समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘हमें (पाकिस्तान) हमारी बेबुनियाद छवि को तोड़ने की जरूरत है।
  • आतंकवाद में हमारी कोई हिस्सेदारी नहीं है, मगर वे हमारे लिए बोझ हैं। हमें अपना इतिहास कुबूल करना होगा और खुद को दुरुस्त भी।’
  • इस्लामाबाद चीन के रुख से चिंतित था और आसिफ ने यह साफ कर दिया था कि पाकिस्तान को ‘अपने दोस्तों को यह बताने की जरूरत है कि हम अपने घर को ठीक कर रहे हैं।
  • वैश्विक स्तर पर हमें शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े, इसके लिए हमें अपने मुल्क को सुधारना ही होगा।’

अन्य

  • यह सही है कि भारतीय कूटनीतिज्ञ आतंकवाद के मसले पर चीन का समर्थन हासिल करने में सफल रहे और पाकिस्तान पर भी दबाव बनाने में कामयाबी पाई थी, फिर भी यह साफ था कि जहां तक चीन-पाकिस्तान के आपसी रिश्तों का सवाल है, जमीनी हकीकत पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला था।
  • घोषणापत्र जारी होने के कुछ दिनों के बाद ही बीजिंग ने पाकिस्तान को यह आश्वस्त कर दिया कि उसे लेकर चीन की नीति में ‘कोई बदलाव’ नहीं आया है।
  • पाकिस्तान में चीन के राजदूत सन वीडोंग का कहना था कि ‘ब्रिक्स घोषणापत्र में उन्हीं संगठनों का जिक्र किया गया है, जो पहले से प्रतिबंधित हैं।’ इसके बाद जब चीन के विदेश मंत्री ने भी इस बाबत आश्वस्त किया, तब आभार जताने पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुद चीन गए।
  • उस वक्त, दोनों देशों ने ट्रंप प्रशासन की नई अफगान नीति को खारिज करने के लिए हाथ मिलाया।
  • ट्रंप से अलग राय रखते हुए चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, ‘कुछ देशों’ द्वारा आतंकवाद से जंग में अपने प्रयासों के लिए पाकिस्तान को ‘पूरा श्रेय’ नहीं दिया जा रहा है, जबकि हमारा मानना है कि पाकिस्तान ने अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है, इसीलिए उसे इसका श्रेय दिया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • यदि चीन और पाकिस्तान की नजदीकियों के संदर्भ में ताजा घटनाक्रम को देखें, तो चीन का यह कदम कोई आश्चर्य नहीं पैदा करता। ब्रिक्स घोषणापत्र पर चीन की सहमति महज सम्मेलन सफल बनाने की उसकी फौरी रणनीति थी।
  • उसकी हमेशा से यही कोशिश रही है कि वैश्विक मंचों पर नई दिल्ली के बढ़ते कद को रोकने के लिए भारत के बराबर पाकिस्तान को खड़ा किया जाए। और उसकी यह रणनीति फिलहाल बदलने वाली नहीं है। मसूद अजहर पर अडंगा लगाकर चीन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत से बेहतर संबंध उसकी प्राथमिकता में नहीं है।
  • वह भारत के क्षेत्रीय व वैश्विक रसूख में हो रही वृद्धि को रोकने की रणनीति का पोषण करता रहेगा। भारत को इसी संदर्भ में अपनी आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक तैयारियां करनी चाहिए।
  • उम्मीद यह भी जताई गई है कि ‘एक दिन उसे एहसास होगा कि संकीर्ण उद्देश्यों के लिए आतंकवाद से समझौतापूर्ण रवैया केवल अदूरदर्शिता है।’